अपोलो हॉस्पिटल किडनी रैकेट का पर्दाफाश, (आवरण-कथा जुलाई 2016)

किडनी रैकेट को दिल्ली पुलिस ने भेजा जेल।

 

यदि कोई व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से अंगदान करता है तो वह मानवीय मूल्यों के अंतर्गत परोपकारी समझा जाता है, जिससे दूसरे किसी अन्य व्यक्ति को एक नया जीवन प्राप्त होता है। परंतु वर्तमान में अंगदान व अंग प्रत्यारोपण एक काला गोरखधंधा बनता जा रहा है। अभी हाल ही में दिल्ली के साउथ ईस्ट डिस्ट्रीक्ट पुलिस ने दिल्ली के नामी अस्पताल अपोलो में ‘किडनी रैकेट’ का गोरखधंधा चलाने वाले एक गैंग का पर्दाफाश किया है। अंगप्रत्यारोपण के नियमों व कानूनों को ताख पर रख कर यह गिरोह कैसे काम कर रहा था तथा पुलिस ने कैसे किया इसका खुलासा ? इस कहानी में विस्तार पूर्वक  है…

 

28 जून को सरिता विहार थाने में एक देवाशीष नामक व्यक्ति आया और एसएचओ मनिंदर सिंह से कहा कि ‘‘साहब मेरी पत्नी कहीं गुम हो गई है। मैं कलकत्ता से अपोलो हॉस्पीटल में उसका इलाज कराने आया था। मेरी पत्नी का मुझसे झगड़ा हो गया था इसलिए वह कहीं चली गई हैं। कृप्या उसे ढुंढ़ने मेें मेरी मदद करें।’’ मनिंदर सिंह ने जब झगड़े का कारण पूछा तो उसने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। जब उन्हांेने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिये कहा तो उसने रिपोर्ट भी नहीं लिखवाई और कहने लगा कि वह उसके दोस्त आसीम (पश्चिम बंगाल) के साथ गई होगी, मिल जायेगी। उसे रिपोर्ट नहीं लिखवानी।

 

ज्वाईंट सीपी आरपी उपाध्याय व डीसीपी एमएस रंधावा प्रेस वार्ता करते हुए ।

देवाशीष ने एसएचओ को यह भी बताया कि वह अपनी पत्नी को ढुंढ़ने के लिये पहले आईपी एस्टेट थाना भी गया हुआ था। उसकी बातों से एसएचओ को लग रहा था कि वह घुमा-फिराकर बात कर रहा है, शायद इसमें कुछ गड़बड़ है। जब उन्होंने शिकायतकर्ता से उसकी पत्नी के बीमारी का कारण पूछा तो उसने बताया कि वह किडनी की समस्या से ग्रसित है। किडनी की समस्या की बात सुनते ही एसएचओ को कुछ शक हुआ, क्योंकि उन्हें किडनी रैकेट के बारे में पहले से हीं कुछ जानकारी थी। शक होने पर उन्होंने हेड कांस्टेबल सतीश कुमार व कांस्टेबल अनिल कुमार को इसके बारे में पूछताछ करने के लिए आदेशित किया। दोनों पुलिसकर्मी इसके बारे में जानकारी जुटाने में लग गये। देवाशीष के बारे में जानने के लिए जब उन्होंने उसका लोकेशन ट्रैक किया तो उसका लोकेशन पहाड़गंज में ट्रैक हुआ।

 

सरिता विहार पुलिस टीम की गिरफ्त में आरोपी

इस संबंध में और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए एसएचओ मनिंदर सिंह ने एएसआई नागेंद्र, हेड कांस्टेबल सतीश, कांस्टेबल अनिल की टीम को पहाड़गंज भेजा। वहां जाकर टीम ने जब जांच-पड़ताल की तो पता चला कि वहां भी किडनी के दो मरीज हैं। पहाड़गंज में इन लोगों को किसी राजकुमार नामक व्यक्ति ने किराये का मकान लेकर रखवाया था। यह जानकारी लेने के बाद पुलिसकर्मी वहां से वापस लौट आये और इसके बारे में अपने एसएचओ को बताया। गहन छानबीन करने के बाद 30 मई को यह पता चला कि किडनी के खरीद-फरोख्त में एक बड़ा गिरोह काम कर रहा है, जिसकी जड़ें पूरे देश में फैली हुई है। इस गिरोह के सदस्य कोलकाता, कानपुर, चेन्नई, व दिल्ली समेत अन्य कई राज्यों मे सक्रिय हैं। गिरोह के सदस्य गरीब लोगों को मोटी रकम का लालच देकर उनकी किडनी डोनेट करने के लिए दिल्ली लेकर आते हैं। किडनी रैकेट का यह गोरखधंधा दिल्ली के अपोलो हॉस्पीटल से संचालित किया जा रहा है। एसएचओ मनिंदर सिंह ने सारी जानकारी प्राप्त करने के बाद इसकी सूचना अपने साउथ-ईस्ट डिस्ट्रिक्ट के डीसीपी एम.एस रंधावा को दी। जब इस सूचना की पुष्टि हुई, तो उन्होेंने अपने ज्वांईट सीपी आरपी उपाध्याय को इस मामले से अवगत कराया। मामले की गंभीरता को देखते हुए ज्वाईंट सीपी आरपी उपाध्याय ने इस मामले पर और गहनता से छानबीन करने के लिए टीम का गठन कर त्वरित कार्रवाई करने के लिये डीसीपी एमएस रंधावा को आदेशित किया। मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए डीसीपी एमएस रंधावा ने सरिता विहार एसीपी निधिन वाल्सन, की निगरानी में कई टीमों का गठन किया। एसएचओ बदरपुर ऐशवीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम कोलकाता भेजी गई। एसआई नागेंद्र के नेतृत्व में एक टीम कानपुर में तैनात की गई। इंस्पेक्टर विजेन्द्र राणा के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली में एक्टिव की गई तथा एटीओ इंस्पेक्टर राम निवास, जैतपुर के नेतृत्व में एक टीम को जयपुर में तहकीकात के लिऐ भेजा गया।

 

अंगदान प्रत्यारोपण नियम

अंगदान प्रत्यारोपण को कानूनी रूप से संचालित करने के लिए मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 बना हुआ है। वर्ष 2014 में इस अधिनियम में एक संशोधन के जरिए एक नई अधिसूचना जारी की गई। इस कानून के तहत अंगो की खरीद-फरोख्त करना गैरकानूनी धंधा है। इस नियम की अवहेलना व अंगो की खरीद-फरोख्त करने पर 3 साल से लेकर 10 साल तक की सजा और 30 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। अंगदान के लिये आयु सीमा कम से कम 18 वर्ष का होना अनिवार्य है। अंगप्रत्यारोपण के लिये हॉस्पिटल मे दो तरह की कमेटियां होती है। नजदीकी रिश्तेदारों से अंगदान के लिये ‘इंटरनल असेस्मेंट कमेटी’ होती है, जिसमें डॉक्टरों के अलावा सामाजिक संगठन के कार्यकर्ता भी शामिल होते हैं। दूर के रिश्तेदारों या परिचितों से अंगदान प्रत्यारोपण के लिए ‘बाहरी कमेटी’ होती है। इस कमेटी में सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं। अंगदान प्रक्रिया के लिए लीगल दस्तावेजों के अलावा नोटरी से शपथ पत्र भी देना पड़ता है। अंगदान प्रत्यारोपण प्रक्रिया में जो हॉस्पिटल में कमेटी होती है वह मरीज और डोनर का सत्यापन करने के बाद ट्रांसप्लांट की स्वीकृति देती है। इसमें एक प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होता है। कमेटी की स्वीकृति के बिना डॅाक्टर प्रत्यारोपण नहीं कर सकते हैं।

 

 

एसीपी निधिन वालसन

किडनी रैकेट के इस मामले में केस दर्ज होने से पहले ही पुलिस ने यह प्रो-एक्टिव उत्तरदायित्व लिया और पूरी लगन से इस मामले की तफ्तीश करने में लग गई। मुखबीरों को भी एक्टिव कर दिया गया। छानबीन के दौरान ही पुलिस को पता चला कि किडनी रैकेट के कुछ सदस्य 2 जून को अपोलो मेट्रो स्टेशन के पास मिलने के लिए आने वाले हैं। एसएचओ मनिंदर सिंह के निर्देशानुसार जांच अधिकारी इंस्पेक्टर विजेन्द्र राणा ने जसोला मेट्रो स्टेशन के पास पहले ही अपनी टीम सहित जाल बिछा दी। जैसे ही यहां तीन लोग पहुंचे, टीम ने मौके पर उन्हें धर-दबोचा। तीनों शख्स की पहचान असीम सिकदर, सत्यप्रकाश व देवाशीष मौलिक के रूप में की गई। पुलिस पूछताछ में इन्होंने इस मामले में खुद को अंजान साबित करने की कोशिश की, परंतु इनके पास से छानबीन करने पर कुछ फेक आधार कार्ड, फोटोग्राफ व फेेक वोटर आईडी कार्ड प्राप्त हुए। फिर इन्होनंे किडनी रैकेट के मामले में शामिल होने की बात स्वीकार किया। इसी आधार पर एफआईआर नम्बर- 286/16, अंडर सेक्शन 420/468/471/120-बी आईपीसी व 18/19/20 ट्रांस्प्लांट ऑफ ह्यूमन ऑर्गन एक्ट (टीएचओए) के तहत थाना सरिता विहार में मामला दर्ज हुआ।

 

 

एसएचओ मनिन्दर सिंह 

पुलिस की एसआईटी टीम
एसएचओ मनिंदर सिंह, सरिता विहार, एसएचओ अतुल कुमार, ओखला, एसएचओ अरविन्द कुमार, अमर कॉलोनी, इंस्पेक्टर नरेश कुमार, स्पेशल स्टाफ, इंस्पेक्टर विजेन्द्र राणा (इंवेस्टीगेशन ऑफिसर), सरिता विहार, एटीओ राम निवास सरिता विहार, एटीओ राम निवास, एनएफसी, एटीओ राजेश, अमर कॉलोनी, एटीओ यु़द्धवीर सिंह, ओखला, एटीओ दिलीप कुमार सीआर पार्क।

तफ्तीश के दौरान यह खुलासा किया कि इस मामले में अपोलो हॉस्पीटल के डॉक्टर अशोक के दो पीएस (निजी सचिव) शैलेस सक्सेना और आदित्य सिंह भी शामिल हैं। इस सूचना के मिलते ही पुलिस टीम ने उन्हें भागने से पहले ही मौके पर गिरफ्तार कर लिया। आदित्य सिंह अपोलो हॉस्पिटल में पिछले 4 वर्षों से डॉक्टर के निजी सचिव (पी.एस) के रूप में कार्य कर रहा था तथा शैलेस सक्सेना पिछले 3 वर्षों से अपोलो हॉस्पिटल में निजी सचिव के रूप में कार्य कर रहा था। इस प्रकार पुलिस टीम ने पाँच आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें 6 दिन के लिए पुलिस रिमांड पर लिया तथा उनसे गहन पूछताछ शुरू की गई।

 

 

आरोपी राजकुमार व सत्यप्रकाश

आरोपी प्रोफाइलः-

1. असीम सिकदर (37 वर्ष), निवासी-सोदेपुर घोला, क्षेत्र विधासागर पल्ली, जिला नॉर्थ -24 सरगना, पश्चिम बंगाल का रहने वाला है। यह डोनर के दिल्ली मे रख-रखाव, खान-पान लेबोरेट्री टेस्ट, मीटिंग नेगोसिएशन इत्यादि का काम का रहा था।

2. सत्यप्रकाश उर्फ आशु, उम्र 30 वर्ष, निवासी- 993 ई गंजन विहार, क्षेत्र बर्रा, कानपुर यूपी का रहने वाला है। वर्ष 2014 में इसने अपनी किडनी डोनेट की थी। उसके बाद वह किडनी गैगं के संपर्क में आया तथा वह इस रैकेट मे संलिप्त हो गया था सत्यप्रकाश डोनर को ढूढने का काम करता था। उसके बाद उन्हें दिल्ली लेकर आता था।
3. देवाशीष मौली उम्र (30 वर्ष) निवासी- गेत बजार, पारा शौकान पल्ली, एनजंपी आउटपोस्ट,जिला, न्यू जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल। यह आरोपी वर्ष 2014 में इस गैंग के सपंर्क में आया था तथा यह डोनर को टारगेट करता था तथा उन्हें दिल्ली लेकर आता था। पकडे़ जाने से एक महीने पहले इसने अपनी पत्नी (ममता मौलिक) का भी किडनी डोनेट किया था।
4. आदित्य सिंह- (24 वर्ष) निवासी- बेरी बाग, अली विहार दिल्ली। वह पिछले चार वर्षों से अपोलो हॉस्पिटल में एक डॉक्टर के पीएस/ निजी सचिव के रूप में कार्य कर रहा था।
5.शैलेश सक्सेना उर्फ सोनू, उम्र-31 वर्ष, निवासी जैतपुर एक्सटेशन पार्ट-1 बदरपुर नई दिल्ली, वह पिछले तीन वर्षों से अपोलो हॉस्पिटल में एक डॉक्टर के पीएस/ निजी सचिव के रूप में कार्य कर रहा था।
6. टी राजकुमार, उम्र- 35 वर्ष, निवासी- हैदराबाद, आंध्रप्रदेश। 10वीं पास, विवाहित। मास्टरमाइंड।
7. बृजेश चौहान, निवासी- गोविंदपुरी, नई दिल्ली। यह आरोपी पिछले 10 वर्षों से अपोलो अस्पताल में निजी सचिव के रूप में कार्य कर रहा था।
8. दीपककर, उम्र- 52 वर्ष, निवासी- सिलीगुड़ी। यह फेक आईडी बनाने का काम करता था।

 

मामले की गंभीरता को देखते हुए इस रैकेट की गहन छानबीन करने के लिए तुरंत ही एक एसआईटी (स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम) का गठन किया गया। तफ्तीश के दौरान पता चला कि इस पूरे रैकेट का मास्टर माइंड टी राजकुमार है जो कि पश्चिम बंगाल, कोलकाता का रहने वाला है। पुलिस टीम को सूत्रों से पता चला कि आरोपी राजकुमार तिरूपति बाला जी मंदिर गया हुआ है। वहां से वह वापस कोलकाता जाने वाला है वहां उसकी सालगिरह व गृह प्रवेश है। पुलिस टीम ने सूचना मुताबिक वहां पहले से ही अपना जाल बिछा दिया तथा राजकुमार के वहां पहुँचते ही उसे दबोच लिया गया तथा कोर्ट में पेशी और ट्रायल के बाद उसे दिल्ली लाया गया। पुलिस पूछताछ में उसने खुलासा किया कि उसने 1-2 वर्षों तक चेन्नई में काम किया था। उसके बाद वर्ष 2005 में कोलकाता में उसने कॉपर-चौक का काम करना शुरू किया, लेकिन इस व्यापार में उसका लगभग 70-80 हजार रुपये का नुकसान हो गया था।

 

सरिता विहार थाने की टीम

इंस्पेक्टर एसएचओ मनिंदर सिंह, इंस्पेक्टर विजेंदर राणा, एसआई नागेन्दर नागर, एसआई सीताराम, एसआई शैलेन्दर, महिला एएसआई सतेन्द्र कौर, हेड कांस्टेबल अजय, हेड कांस्टेबज मनोज, हेड कांस्टेबल सतीश, कांस्टेबल राकेश, कांस्टेबल अनिल कुमार, कांस्टेबल सतबीर, कांस्टेबल जयप्रकाश व कांस्टेबल दिलशाद।

 

 

एसआई नागेन्दर नागर 

इसलिए उसने वर्ष 2006 में 1 लाख 72 हजार रूपये में अपनी किडनी बेच दी। वर्ष 2013-14 में वह कोयमबटूर (साउथ इंडिया) गया, जहां उसकी मुलाकात सुभेन्दू नामक व्यक्ति से हुई तथा उसी के साथ मिलकर उसने किडनी खरीदने-बेचने का धंधा शुरू किया। लेकिन कुछ समय बाद इस मामले में मुकदमा हो गया और वहां का हॉस्पिटल बंद हो गया। उसके बाद वर्ष 2015 में वह दिल्ली आया तथा यहां उसने किडनी खरीद-फरोख्त का धंधा शुरू कर दिया। राजकुमार ने यह भी खुलासा किया कि वह डॉक्टर के पीएस से मिलता था फिर किडनी के जरूरतमंद लोगों के बारे में पूछता था।असीम सिकदर डोनर को दिल्ली मे रख-रखाव, खान-पान, लेबोरेट्री टेस्ट, मीटिंग नेगोसिएशन इत्यादि का काम करता था। डोनर के रख-रखाव के लिए उनलोगों ने पटेल नगर व पांडव नगर में किराये का मकान लेकर रखते थे।सत्यप्रकाश और देवाशीष मौली डोनर को ढूंढने का काम करते थे तथा उसके बाद उन्हें दिल्ली लेकर आते थे। पेसेंट व रिसीवर के आने के बाद दीपककर उनका फेक आईडी कार्ड बनाता था तथा फेक आईडी कार्ड बनने के बाद पीएस को सौंप दिया जाता था। पीएस किडनी प्रत्यारोपण की फाइलें तैयार करते थे। पीएस के पास फाईल तैयार होने के बाद उसे डॉक्टर के पास भेज दिया जाता था तथा डॉक्टर के बाद फाईल कमेटी के पास भेजी जाती थी। कमेटी द्वारा फाईल की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसकी विडियोग्राफी की जाती थी, उसके बाद ही किडनी ट्रांसप्लांट की जाती थी।

 

एएसआई सतेन्द्र कौर

खुलासे में यह बात सामने आई कि सत्यप्रकाश उर्फ आशु पंजाब, जालंधर में किडनी रैकेट के मामले में शामिल रह चुका है। आरोपी आसीम ने पहले राजकुमार को अपनी किडनी बेची थी उसके बाद वह उसके साथ इस रैकेट में शामिल हो गया। आरोपी दीपककर ने अमेरिका में अपनी किडनी निकलवाई थी। इस गिरोह के सदस्य किडनी डोनेट करने के लिए कोलकाता में अखबार में इस्तिहार निकलवाते थे। दीपककर को पुलिस ने कोलकाता से गिरफ्तार किया तथा कोर्ट में पेशी के बाद उसे दिल्ली लाया गया। पूछताछ में उसने खुलासा किया कि इस मामले में अपोलो हॉस्पिटल का एक अन्य पीएस बृजेश चौहान भी शामिल है। छानबीन करने के बाद पुलिस ने बृजेश चौहान को उसके निवास स्थान गोविंदपुरी से गिरफ्तार कर लिया। 23 जून को पुलिस को पता चला कि इस मामले में शामिल एक अन्य आरोपी आशुतोष, निजारा हॉस्पिटल (साउथ) में चेकअप करवाने के लिए आने वाला है। पुलिस ने मौके पर आशुतोष को वहां से गिरफ्तार किर लिया। साथ ही इसमें चार डोनर उमेश श्रीवास्तव, नीलू श्रीवास्तव, ममता मौलिक व भानू प्रताप सिंह को भी गिरफ्तार किया गया।

 

जसोला अपोलो किडनी रेकैट के मामले में संयुक्त पुलिस आयुक्त दक्षिण-पूर्वी रेंज आरपी उपाध्याय ने बताया कि ‘‘किडनी ट्रांसप्लांट के लिये एक्ट 1994 बनाया गया है, जिसके कुछ महत्वपूर्ण सेक्शन यह डिफाइन करते हैं कि किससे किडनी लिया जा सकता है और इसके लिये क्या प्रक्रिया है ? इस कानून के तहत सारी प्रकिया विडियोग्राफी के जरिए की जाती हैै, इस कानून में सारे प्रावधान इसलिए दिए गए हैं ताकि इस पूरी प्रक्रिया में कमेटी की तरफ से गलती की कोई गुजाइंश न रहे। नजदीकी रिश्तेदारों जिसमें पत्नी, सास, ससुर, पिता, भाई, बहन, पौते, पौती इत्यादी शामिल हैं- इसके लिए एक अलग प्रक्रिया है। अगर रिश्ता पत्नी का है या भाई का है तो कैसे निर्णय लिया जायेगा ? इसके लिये हॉस्पीटल में एक ‘इंटरनल असेसमेंट कमिटी’ होती है, जो केस को प्रक्रिया में आने से पहले यह निर्णय लेती है कि रिसीवर ने जो सूचना दी है, वह कितना सत्य है। उसमें विवाह प्रमाण पत्र, रिलेशनशिप प्रुफ और मेडिकल ‘असेसमेंट ऑफ दी डोनर’ इत्यादि की आवश्यकता होती है। यह कमेटी प्रत्येक हॉस्पीटल मंे होती है। लेकिन किडनी रैकेट के मामले में जितने भी डॉक्यूमेंट पाये गये हैं, सभी फर्जी हैं- जैसे जिन केसेस में पत्नी को दिखाया गया है, उसमें सारी डिटेल उसकी है, लेकिन उसमें फोटो उसकी नहीं, बल्कि किसी और की है।

किडनी डोनर-
1. उमेश श्रीवास्तव, उम्र- 42 वर्ष, निवासी- कानपुर
2. नीलु श्रीवास्तव, उम्र- 38 वर्ष, निवासी- कानपुर
3. ममता मौलिक, उम्र- 32, निवासी-सिलीगुड़ी,(आरोपी देवाशीष मौलिक की पत्नी)
4. भानू प्रताप सिंह, 42 वर्ष, निवासी-कानपुर

डोनर को 2-4 लाख रूपये दिये जाते थे। रिसीवर 25-40 लाख रूपये में खरीदते थे। बिचौलिये को लगभग 1 लाख रूपये प्राप्त होते थे।

इस गिरोह के बिचौलिये इन लोगों को किडनी डोनेट करने के लिए बहला-फुसलाकर दिल्ली लाये थे। ये दिल्ली के अलग-अलग होटल में इन्हें रखते थे। यहां पर जब उन्हें किडनी प्राप्तकर्ता मिल जाता था तो वह उसकी जांच कराकर फिर इस केस को हॉस्पिटल मंे ले जाया करते थे। केस हॉस्पिटल में जाने के बाद जो वहां की ‘अधिकृत कमिटी’ है, वह इन सभी प्रकियाओं के देखती है और फिर उसको मंजूरी देती है। इन पांचों केसेस मंे जिनमें दो केस में पत्नी ने दिया है, 1 केस में भाई ने दिया है, एक में अंकल ने दिया है और एक केस में बहनोई (ब्रदर-इन-लॉ) ने दिया है, इनके जितने भी दस्तावेज हैं, वे सभी फर्जी हैं।

एसएचओ मनिंदर सिंह ने बताया कि किडनी रैकेट के इस मामले में 12 आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ ही हॉस्पिटल के सभी फर्जी इलैक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स व सभी दस्तावेजों को सीज़ कर दिया गया है। इस मामले में अभी इस गिरोह के 5 अन्य सदस्यों के बारे में भी जानकारी मिली है, जिसपर पुलिस तफ्तीश कर रही है। किडनी रैकेट के इस मामले में अभी अनगिनत आरोपियों के पकड़े जाने की संभावना है, जिसकी पुलिस टीम छानबीन कर रही है।

किडनी रैकेट के इस बड़े गिरोह का पर्दाफाश करने में साउथ-ईस्ट डिस्ट्रीक्ट पुलिस ने सराहनीय कार्य किया है, जिसमें एसएचओ मनिंदर सिंह, (सरिता विहार) ने अपनी पुलिसिया नज़र से इस मामले की तहकीकात कर गिरोह के पर्दाफाश करने में अहम योगदान दिया है।

रिपोर्ट- सीमा देव रजक

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